Published in Navbharat Times 4th October 2026
...धातु की वह बारीक ऩक्क़ाशी बेहद नाज़ुक और ख़ूबसूरत थी, जिसमें पीढ़ियों का इल्म और हुनर समाया हुआ था। ज़ाहिर है, पारंपरिक अल्बानियाई चाँदी के झुमके और...
मदर टेरेसा के देश में आपका स्वागत है! वैसे तो मदर टेरेसा का जन्म स्कोप्ये में हुआ था, जो आज नॉर्थ मैसेडोनिया में है, लेकिन उन्हें अपनी अल्बानियाई जड़ों पर हमेशा गर्व रहा। तिराना इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर आनेवालों का स्वागत उन्हीं का नाम करता है, और यहीं, इस छोटे मगर चुस्त-दुरुस्त एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही हमारे ड्राइवर एरिन ने हमारी अगवानी की।
अल्बानिया की राजधानी तिराना पहुँचना मेरे लिए एक सुखद संयोग था। मुझे नील, वीणा, सुधीर और परिवार के बाक़ी लोगों से मिलना था, जो हमारी फैमिली हॉलिडे के लिए पहले से मोंटेनेग्रो में थे। लेकिन जब मेरी बेटी सारा के ग्रेजुएशन और दीक्षांत समारोह की तारीख़ें बदल गईं, तो मुझे अपना ट्रैवल प्लान बदलना पड़ा और उन तक पहुँचने का कोई और रास्ता ढूँढना पड़ा।
सीधा-सा रास्ता तो यही था कि मैं मोंटेनेग्रो या क्रोएशिया की फ़्लाइट ले लूँ, लेकिन आख़िरी व़क्त पर बुकिंग करने की वजह से कोई मुनासिब फ़्लाइट मिल ही नहीं रही थी। मैंने ऩक्शा खोला, मोंटेनेग्रो से ड्राइविंग की दूरी पर मौजूद एयरपोर्ट तलाशने लगी, और तभी मेरी नज़र तिराना पर पड़ी।
दुनिया में कुछ जगहें ऐसी होती हैं, जहाँ उतरते ही आप सोचने लगते हैं कि काश, यहाँ थोड़ा ज़्यादा रुकने का प्लान बनाया होता। अल्बानिया भी ऐसी ही एक जगह थी। हमारा ड्राइवर एरिन बड़ा ही मिलनसार, ख़ुशमिज़ाज और पूरी तरह “आपकी ख़िदमत में हाज़िर” क़िस्म का इंसान था। तिराना को देखकर मेरा पहला एहसास यही था कि यह शहर कितना स़ाफ-सुथरा, हरा-भरा और ख़ूबसूरत है। चौड़े बुलेवार्ड, पेड़ों से घिरे पार्क, रंग-बिरंगी इमारतें और फुटपाथ पर सजे क़ैफे - इन सबने शहर को एक ऐसी शख़्सियत दी थी, जो ऊर्जा से भरी होने के साथ-साथ बेहद सुकून भरी भी थी।
यूरोप के चौराहे पर बसा एक देश
अल्बानिया दक्षिण-पूर्वी यूरोप में, पश्चिमी बाल्कन इलाक़े में बसा है। इसके उत्तर और उत्तर-पूर्व में मोंटेनेग्रो और कोसोवो हैं, पूर्व में नॉर्थ मैसेडोनिया और दक्षिण में ग्रीस। पश्चिम में इसका समुद्र तट एड्रियाटिक और आयोनियन सागर से मिलता है। समंदर के उस पार ही इटली है, और शायद यही वजह है कि यहाँ के खान-पान, ़फैशन, वास्तुकला और क़ॉफी के प्रति दीवानगी में इटली की झलक स़ाफ दिखाई देती है। इस देश की कहानी प्राचीन इलिरियन लोगों तक जाती है। बाद में यह रोमन और बाइज़ेंटाइन हुकूमत के अधीन रहा, कुछ दौर में यहाँ स्लाविक असर भी रहा, और कई सदियों तक यह ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा बना रहा। अल्बानिया के सबसे बड़े राष्ट्रीय नायक ग्योर्ग कस्त्रियोती हैं, जिन्हें स्कैंडरबेग के नाम से ज़्यादा जाना जाता है। पंद्रहवीं सदी के इस नेता ने अल्बानियाई राजकुमारों को एकजुट किया और दो दशकों से भी ज़्यादा समय तक ऑटोमन फ़ौजों का डटकर मुक़ाबला किया।
आधुनिक अल्बानिया ने 1912 में इस्माइल केमाली की अगुवाई में ऑटोमन साम्राज्य से आज़ादी का ऐलान किया। पारंपरिक मायनों में अल्बानिया का कोई एक संस्थापक नहीं है; यह देश कई देशभक्तों की कोशिशों से खड़े हुए एक राष्ट्रीय आंदोलन से उभरा, हालाँकि आधुनिक अल्बानियाई राष्ट्र के मुख्य संस्थापक के रूप में केमाली को ही याद किया जाता है।
दोनों विश्व युद्धों की उथल-पुथल के बाद देश एनवर होजा की अगुवाई में एक लंबे कम्युनिस्ट दौर में दाख़िल हुआ। दूसरे विश्व युद्ध के ख़ात्मे से लेकर 1990 के दशक की शुरुआत तक अल्बानिया यूरोप के सबसे अलग-थलग देशों में से एक बन गया। धर्म पर पाबंदी लगा दी गई, आने-जाने पर सख़्त रोक थी, और हमले के डर से सरकार ने पूरे देश में कांक्रीट के हज़ारों बंकर बनवा डाले थे। आज का अल्बानिया उस मुश्किल अतीत को किसी सार्थक चीज़ में बदलने के लिए कमर कसे हुए नज़र आता है। कभी नियंत्रण की प्रतीक रहीं जगहें अब म्यूज़ियम, गैलरी और सार्वजनिक स्थल बन चुकी हैं।
तिराना: क़ॉफी, रंग और नया रूप
यहाँ क़ॉफी स़िर्फ शौक़ नहीं, एक रिवायत है! जब सारा ने ग़ौर किया कि सड़कों के किनारे बने अनगिनत क़ॉफी बार में इतने सारे लोग आराम से बैठकर व़क्त बिता रहे हैं, तो एरिन मुस्कुरा दिया। “जब हमें किसी के साथ बिज़नेस करना होता है, तो हम उसे क़ॉफी पर बुलाते हैं,” उसने समझाया। “हम मिलते हैं, बातें करते हैं, और काम बन जाता है।” यहाँ क़ॉफी स़िर्फ एक पेय नहीं है; यह ठहरने, ख़यालों का लेन-देन करने और रिश्ते बनाने का न्योता है।
अगली सुबह हमने एक पैनोरमिक टूर कर ही लिया। यहाँ के सबसे दिलचस्प लैंडमार्क्स में से एक है पिरामिड ऑ़फ तिराना। यह 1988 में एनवर होजा को समर्पित एक म्यूज़ियम के रूप में खुला था। आज इसे पूरी तरह बदलकर एक कल्चरल और टेक्नोलॉजी सेंटर बना दिया गया है। इसकी ढलवाँ बाहरी दीवारों पर सीढ़ियाँ बनी हैं, जिन पर चढ़कर लोग - ख़ासकर नौजवान - उस इमारत पर अपना हक़ जताते हैं, जो कभी तानाशाही से जुड़ी थी।
हमारा अगला पड़ाव एक अजीब तरह से जानी-पहचानी संरचना थी: द क्लाउड, या रेया, जिसे जापानी आर्किटेक्ट सू फ़ुजीमोतो ने डिज़ाइन किया है। मुझे याद आया कि मैंने इसे लंदन में हाइड पार्क के पास सर्पेंटाइन गैलरी पवेलियन के रूप में देखा था। इसका नाज़ुक सफ़ेद ढाँचा इमारत और मूर्तिकला के बीच की लकीर को धुँधला कर देता है, और लोगों को इस पर चढ़ने, बैठने, इकट्ठा होने और ख़ुद इस कलाकृति का हिस्सा बन जाने का न्योता देता है।
हम गुलाबी रंगत वाली ख़ूबसूरत सरकारी मंत्रालय की इमारतों के पास से गुज़रे और फिर शीत युद्ध के दौरान बने कांक्रीट के एक छोटे-से बंकर पर जा पहुँचे। तिराना के बड़े भूमिगत बंकरों को बंक आर्ट म्यूज़ियम में बदल दिया गया है, जहाँ कला और ऐतिहासिक प्रदर्शनियाँ दिखाती हैं कि तानाशाही के दौर में रोज़मर्रा की ज़िंदगी कैसी थी।
तिराना में भूकंप का ख़तरा भी रहता है, और एरिन को उम्मीद थी कि सारे नए निर्माण ज़रूरी सुरक्षा मानकों पर खरे उतरेंगे। मैंने भी मन ही मन यही दुआ की। बन रही लगभग हर नई इमारत वास्तुकला के लिहाज़ से बेहद अनूठी लग रही थी, और मैं सोच सकती थी कि कुछ ही सालों में यहाँ की स्काईलाइन कितनी बदल जाएगी।
राजधानी के बीचोबीच है स्कैंडरबेग स्क्वेयर, एक विशाल और शानदार सार्वजनिक चौक, जिसका नाम अल्बानिया के राष्ट्रीय नायक के नाम पर रखा गया है। घोड़े पर सवार उनकी प्रतिमा एक ऐसे चौक को निहारती है, जिसके चारों ओर देश के इतिहास की कई परतें बिखरी हैं - ऑटोमन दौर की एथेम बे मस्जिद, क्लॉक टॉवर, सांस्कृतिक संस्थान और आकर्षक आधुनिक इमारतें।
उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में बनकर तैयार हुई यह मस्जिद ख़ास तौर पर बेहद ख़ूबसूरत है, जिसमें फूलों, पेड़ों और प्राकृतिक नज़ारों के नाज़ुक भित्तिचित्र बने हैं। यह धार्मिक संस्थानों के ख़िल़ाफ कम्युनिस्ट सरकार की मुहिम से बच निकली और आज डटे रहने के जज़्बे और अल्बानिया के लंबे ऑटोमन अध्याय, दोनों की याद दिलाती है।
तिराना का एक और दिलचस्प हिस्सा है ब्लोकू। कम्युनिस्ट शासन के दौरान यह इलाका एनवर होजा, बड़े अ़फसरों और सियासी अभिजात वर्ग के लिए आरक्षित था, आम अल्बानियाई लोगों को यहाँ कदम रखने की इजाज़त नहीं थी। आज यह शहर के सबसे रौनक भरे इलाक़ों में से एक है, जो फ़ैशनेबल क़ैफे, रेस्टोरेंट, बूटीक और बार से भरा हुआ है। यह अपनी जगहों के मायने बदल देने के तिराना के हुनर की एक और मिसाल है।
श्कोदर तक का ख़ूबसूरत रास्ता
इसके बाद हमने राजधानी को अलविदा कहा और उत्तर की ओर रास्ते में श्कोदर में रुकते हुए मोंटेनेग्रो के लिए अपने रोड ट्रिप को शुरू किया। तिराना से श्कोदर तक की ड्राइव बेहद सुहानी थी। जैसे-जैसे शहर पीछे छूटता गया, नज़ारे खुलते गए-हरे-भरे देहात, चौड़ी घाटियाँ और पहाड़ों के ख़ूबसूरत दृश्य।
श्कोदर, जिसे श्कोद्रा भी कहते हैं, अल्बानिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है । यह छोटा, सौम्य और बेहद दिलकश शहर है, जहाँ कम ऊँचाई वाली इमारतें, क़ैफे और दुकानों से सजी एक ख़ूबसूरत पैदल सड़क है। साइकिल चलाना यहाँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी का अहम हिस्सा लगा। सत्तर साल या उससे भी ज़्यादा उम्र की महिलाओं को अपने रोज़ के काम निपटाते हुए पूरे आत्मविश्वास के साथ सड़कों पर साइकिल चलाते देखकर मुझे ख़ास तौर पर बड़ी प्रेरणा मिली।
यह शहर श्कोदर झील के क़रीब बसा है, जो बाल्कन की सबसे बड़ी झील है और जिसे अल्बानिया और मोंटेनेग्रो आपस में साझा करते हैं। यह चारों ओर से नदियों से घिरा है और उत्तरी अल्बानिया के पहाड़ इस पर पहरा देते हैं।
शहर के ऊपर रोज़ाफ़ा क़िला सिर उठाए खड़ा है। यह एक प्राचीन क़िला है, जिसकी जड़ें इलिरियन दौर में हैं और जिसमें बाद में रोमन, मध्यकालीन, वेनिस और ऑटोमन दौर के हिस्से जुड़ते गए। अपनी रणनीतिक पहाड़ी से यह बुना, द्रीन और कीर नदियों के संगम को निहारता है। यह किला रोज़ाफ़ा की एक दिल को छू लेने वाली अल्बानियाई लोककथा से भी जुड़ा है। कहा जाता है कि रोज़ाफ़ा नाम की एक युवती को इसकी दीवारों में चुनवा दिया गया था, ताकि किला हमेशा खड़ा रहे। उसकी कहानी बलिदान, व़फादारी और ‘बेसा’ की प्रतीक है।
श्कोदर की धार्मिक इमारतें भी अल्बानिया की परत-दर-परत पहचान को दर्शाती हैं। एक ही शहर में मस्जिदें और कैथोलिक चर्च साथ-साथ खड़े हैं, जो सदियों तक बदलते साम्राज्यों, संस्कृतियों और आस्थाओं के गवाह रहे हैं। ऑटोमन शैली का चौक और ऐतिहासिक मस्जिद हमें किसी और ही ज़माने में ले गए, जबकि चहल-पहल भरी पैदल सड़कों ने श्कोदर को पूरी तरह आज का शहर बना दिया।
वहाँ मेरी सबसे पसंदीदा खोजों में से एक थी वो दुकान, जहाँ एक कलाकार हाथ से स्टर्लिंग सिल्वर के गहने बना रहा था और फ़िलिग्री की पारंपरिक अल्बानियाई कारीगरी को ज़िंदा रखने में जुटा था। धातु की वह बारीक ऩक्क़ाशी बेहद नाज़ुक और ख़ूबसूरत थी, जिसमें पीढ़ियों का इल्म और हुनर समाया हुआ था। ज़ाहिर है, पारंपरिक अल्बानियाई चाँदी के झुमके और एक ब्रेसलेट ख़रीदे बिना मैं वहाँ से निकल ही नहीं सकती थी।
इसके बाद हमने वही किया, जो किसी भी प्यारे यूरोपीय चौक में हर सैलानी को करना चाहिए - हम स्वादिष्ट जेलातो लेकर बैठ गए, धूप का लुत़्फ उठाया और दुनिया को आते-जाते देखते रहे।
देखे जाने का इंतज़ार करता अल्बानिया
अल्बानिया एक ऐसा देश है, जहाँ इतिहास और उम्मीद साथ-साथ नज़र आते हैं। यह अब भी यूरोप का एक छुपा हुआ नगीना है, लेकिन शायद बहुत दिनों तक छुपा नहीं रहेगा। अगर आप यूरोप की जानी-पहचानी राजधानियों से आगे बढ़कर उसके कुछ दिलचस्प, कम मशहूर देशों को देखना-घूमना चाहते हैं, तो वीणा वर्ल्ड का बाल्कन यूरोप टूर आपके लिए एकदम सही है। यह स़फर आपको एक ऐसे इलाके से रूबरू करवाता है, जो इतिहास की परतों, अलग-अलग संस्कृतियों, शानदार नज़ारों और ऐसी जगहों से भरा है, जो आज भी आपको हैरान कर सकती हैं।
इतनी जल्दी अल्बानिया छोड़ते हुए मैं सचमुच उदास थी। जो आख़िरी व़क्त पर रास्ते में किया गया एक बदलाव था, उसने मुझे एक ऐसे रोमांचक देश से मिलवा दिया था, जो रंगों, इतिहास, नाटकीय दृष्यों, लाजवाब खाने और बेहिसाब संभावनाओं से भरा हुआ है। और सबसे बढ़कर, यहाँ के लोग ही थे जिन्होंने इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा दिए। हम जहाँ भी गए, लोग गर्मजोशी, अपनेपन और मेहमाननवाज़ी से मिले। उनकी गर्मजोशी ने इस छोटे-से स़फर को भी बेहद निजी बना दिया, और सरहद पार करने के बहुत बाद तक उनकी मेहमाननवाज़ी मेरे ज़ेहन में बसी रही।
लौटते व़क्त मैंने ख़ुद से एक वादा किया: अगली बार अल्बानिया कोई सुखद संयोग या कहीं और जाते हुए बीच का छोटा-सा पड़ाव नहीं होगा। मैं ज़्यादा व़क्त लेकर लौटूँगी, इत्मीनान से क़ॉफी की चुस्कियाँ लेने, तिराना की गलियों में घूमने, श्कोदर को जी भरकर देखने, पहाड़ों में ट्रेकिंग करने, रिविएरा के किनारे-किनारे स़फर करने और वह सब कुछ देखने, जिन्हें मुझे मजबूरन किसी और दिन के लिए छोड़ना पड़ा था।





































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