We're open, now in Nagpur, HSR Layout (Bengaluru) & Salt Lake (Kolkata). Locate Us
We're open, now in Nagpur, HSR Layout (Bengaluru) & Salt Lake (Kolkata). Locate Us
USA

Explore Veena World Travel Stories

  • Travel Inspiration
  • Destination Guides
  • Travel Tips

कुछ सीखानेवाली राहें...

13 mins. read
Sunila Patil
Sunila Patil
13 Mins Read
September 04, 2026
September 04, 2026

Quick Summary

पुणे के ट्रैफिक में भी लोग हाथ हिलाकर रास्ता देते हैं, और हर रुकावट एक बिना ऐलान सबक बन जाती है।

सिएटल में प्रीपेड गिफ्ट कार्ड से कॉफी का बिल ज्यादा निकला तो काउंटर पर लड़के ने ऑर्डर कैंसल नहीं कराया और चिंता नहीं करने को कहा।

हर शहर में शॉपिंग करते समय रैक्स के पीछे दबे कोने देखें, क्योंकि असली माल अक्सर बड़े डिस्काउंट के साथ वहीं छुपा होता है।

टोक्यो में एस्केलेटर पर हमेशा दाईं तरफ खड़े रहें और बाईं तरफ जल्दी वालों के लिए रास्ता छोड़ें।

मोरक्को में पुदीने की चाय मेहमाननवाज़ी का रूह का फ़र्ज़ है, इसलिए बिना चाय पिलाए विदा नहीं करते।

न्यूज़ीलैंड में ड्राइवरों की विनम्रता और रास्ता देने की आदतें भी यादगार सबक बन जाती हैं।

Published in Navbharat Times 6th September 2026

...और अब पुणे के अफ़रा-तफ़री वाले ट्रैफ़िक में भी, वो अक्सर रुककर किसी और गाड़ी को रास्ता दे देती हैं, हाथ हिलाकर, और आस-पास वालों को यक़ीन ही नहीं होता...

 

हर बार जब मैं एयरपोर्ट से निकलकर होटल तक पहुँचती हूँ, बीच के फ़ासले में कहीं न कहीं एक सबक इंतज़ार कर रहा होता है - बिन बुलाए, बिना ऐलान के। कभी यह किसी अजनबी की उस मेहरबानी की शक्ल में आता है जिसकी उम्मीद नहीं थी, तो कभी एक एस्केलेटर, एक कप चाय, या घास में बेफ़िक्र लेटे किसी शेर के भेस में। इतने सफ़र कर चुकी हूँ कि अब भरोसा हो गया है - दुनिया की सबसे बड़ी क्लासरूम की कोई दीवार नहीं होती, और उसके सबसे अच्छे टीचर्स कभी जान-बूझकर मुझे कुछ सिखाने की कोशिश नहीं करते।

सिएटल: छुट्टे पैसों में छुपी मेहरबानी

मैं सिएटल में थी, सुबह-सुबह टहलने निकली थी, शहर को अभी ठीक से जान भी नहीं पाई थी और उसकी रौनक में डूबी हुई थी। टहलते-टहलते कॉफ़ी की तलब लगी, और मैंने काउंटर पर अपना इकलौता कार्ड थमा दिया -एक प्रीपेड गिफ़्ट कार्ड। पता तब चला जब बिल दो डॉलर ज़्यादा निकला। न पास कैश था, न कोई दूसरा कार्ड, आख़िर टहलने ही तो निकली थी। थोड़ा शर्मिंदा होकर मैंने काउंटर पर खड़े उस लड़के से कहा कि ऑर्डर कैंसल कर दो। उसने बस हाथ हिलाया और मुस्कुराकर कहा, "कोई बात नहीं, आपकी कॉफ़ी बनेगी, चिंता मत कीजिए।" इतनी छोटी सी बात, मगर उसने पूरा दिन बना दिया। मैंने वो अच्छा मूड आगे बाँटना शुरू कर दिया - दरबान को, अगले स्टॉप की बरिस्ता को, रास्ता पूछने वाले किसी अजनबी को। तभी समझ आया कि मेहरबानी सच में एक-दूसरे को छूती चली जाती है, और जितना हम सोचते हैं, उससे कहीं तेज़ फैलती है।

उसी ट्रिप में, शॉपिंग करते वक़्त एक और छोटा मगर काम का सबक मिला - जो रैक्स दुकान के सबसे पीछे कोने में दबे रहते हैं, असली माल वहीं छुपा होता है, बड़े-बड़े डिस्काउंट के साथ, जबकि सामने वाली टेबल्स तो बस दिखावे के लिए सजी होती हैं। तब से मैं हर शहर में यही तरीक़ा अपनाती हूँ - हाँ, अगर लेटेस्ट चीज़ ही खरीदनी हो तो बात अलग है। सफ़र एक ही दोपहर में बड़ी-बड़ी सीखें भी दे देता है और छोटी-छोटी तरकीबें भी, और कभी नहीं बताता कि इनमें फ़र्क़ क्या है।

जापान: शहर का वो अनकहा कायदा

हर शहर का अपना एक व्याकरण होता है - एक तयशुदा नियम जो कोई लिखता नहीं, पर सब मानते हैं, और ध्यान दें तो सफ़र आपको भरपूर इनाम देता है। टोक्यो में सीखा कि एस्केलेटर पर हमेशा दाईं तरफ़ खड़े रहना है, बाईं तरफ़ का रास्ता उन लोगों के लिए खुला छोड़ना है जिन्हें ट्रेन पकड़ने की जल्दी है - या जैसा गाइड ने मुस्कुराकर कहा, "पता नहीं किस राष्ट्रीय आपातकाल के लिए भाग रहे हों।" हमारे आगे कुछ टूरिस्ट्स अनजाने में एस्केलेटर की दोनों साइड घेरे खड़े थे, तभी एक जापानी सज्जन तेज़ी से नीचे आए, साफ़ दिख रहा था कि देर हो रही है, फिर भी वो उनके पीछे रुककर चुपचाप इंतज़ार करने लगे। गाइड ने बताया कि जल्दी में होने पर भी किसी साथी यात्री को धकेलकर आगे निकलना उन्हें बदतमीज़ी लगेगा - वो बस अपनी बारी का इंतज़ार करेंगे। यह छोटा सा सबक मैं अपने साथ घर ले आई, और इसने मुझे हर लाइन में थोड़ा ज़्यादा सब्र वाला इंसान बना दिया है।

मोरक्को: अजनबी के लिए उंडेली गई चाय

मोरक्को ने भी लगभग यही सबक सिखाया, बस पैकिंग अलग थी - गिलास और भाप में लिपटी हुई। यहाँ रियाद हो या सड़क किनारे का ठेला, हर जगह पुदीने की चाय पेश की गई, ऊँचाई से गिलास में उंडेलकर, बार-बार, ऐसे लोगों के हाथों जिनके पास शायद मुझसे कहीं कम था देने को। यहाँ मेहमाननवाज़ी कोई शिष्टाचार नहीं, रूह का फ़र्ज़ मानी जाती है - मेहमान को बिना चाय पिलाए विदा नहीं करते, बाक़ी चाहे कुछ भी हो या न हो। मुझे याद है, किसी ने आधा कहावत, आधा चेतावनी की तरह बताया था - पहला गिलास ज़िंदगी जैसा कड़वा, दूसरा मोहब्बत जैसा गहरा, और तीसरा मौत जैसा मीठा - तीनों पीने ही पड़ते हैं, वरना बुरा मान लिया जाता है। जो बात दिल में रह गई, वो चाय नहीं, बल्कि वो सहजता थी जिससे यह दी जा रही थी - न कोई हिसाब, न बदले में कुछ पाने की उम्मीद। इसने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि मैं ख़ुद कितनी बार अपनी उदारता को इस तराज़ू में तौलती हूँ कि कितना खोने की गुंजाइश है।

न्यूज़ीलैंड: शराफत जो समंदर पार कर गई

हर सबक के लिए मंदिर जाना या चाय की रस्म देखना ज़रूरी नहीं, कुछ सबक तो सबसे मामूली सामान के साथ घर तक चले आते हैं। हाल ही में मैंने मशहूर फाइनेंशियल एक्सपर्ट रचना रानडे के साथ एक पॉडकास्ट रिकॉर्ड किया, जो इन्वेस्टिंग सिखाती हैं, और उन्होंने न्यूज़ीलैंड में गाड़ी चलाने का एक क़िस्सा सुनाया जो मैं आज तक नहीं भूली। उन्होंने देखा कि वहाँ के ड्राइवर सड़क पर कितने विनम्र होते हैं, कितनी आसानी से एक-दूसरे को रास्ता देते हैं, और हॉर्न बस असली ज़रूरत में बजता है, बेसब्री में शायद ही कभी। यह आदत वो अपनी तस्वीरों और हरी-भरी पहाड़ियों की यादों के साथ घर ले आईं, और अब पुणे के अफ़रा-तफ़री वाले ट्रैफ़िक में भी, वो अक्सर रुककर किसी और गाड़ी को रास्ता दे देती हैं, हाथ हिलाकर, और आस-पास वालों को यक़ीन ही नहीं होता। यही तो सफ़र की सबसे ख़ामोश मगर सबसे पक्की कारीगरी है, दुनिया के दूसरे कोने से उठाई गई एक आदत, सीधे किसी आम मंगलवार की सुबह के दफ़्तर जाने वाले रास्ते में उतर आती है।

पेरू: जो लो, वो लौटाओ भी

पेरू में एंडीज़ की ऊँचाइयों पर मुझे एक और जुड़ा हुआ ख़याल मिला, ‌‘आइनी‌’ (ayni), क्वेचुआ भाषा का यह सिद्धांत, जो वहाँ की ज़िंदगी में चुपचाप बसा हुआ है, आपसी लेन-देन की बराबरी का सिद्धांत। कुछ भी पीने से पहले, थोड़ी सी चीचा या पानी की बूँद धरती माँ (पचामामा) के नाम ज़मीन पर गिराई जाती है - याद दिलाने के लिए कि कुछ भी यूँ ही नहीं लिया जाता, सब कुछ अदला-बदली से मिलता है। वहाँ के किसान आज भी बारी-बारी एक-दूसरे के खेतों में काम करते हैं, बदले में बस इतनी उम्मीद रखते हुए कि उनकी फ़सल की बारी आने पर वैसी ही मदद उन्हें भी मिलेगी।

माचू पिच्चू की सीढ़ीदार पहाड़ियाँ, इंजीनियरिंग का चमत्कार, सिर्फ़ इसलिए बन पाईं क्योंकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूरा समाज मिलकर उन्हें पत्थर-पत्थर जोड़ता रहा। उन पुराने खेतों पर खड़े होकर मैं सोचती रह गई कि आजकल की ज़िंदगी कितनी लेने पर टिकी है, बिना वापस देने के बारे में सोचे - और जब कोई संस्कृति दोनों पर ज़ोर देती है, तो पैरों तले की ज़मीन, यहाँ तो सच में भी, कहीं ज़्यादा मज़बूत महसूस होती है।

बाली: संतुलन की रोज़ की इबादत

बाली में सबक कोई एक पल नहीं था, बल्कि एक लय थी जो हर सुबह दोहराई जाती है। ‌‘चनांग सारी‌’ नाम के छोटे प्रसाद - ताड़ के पत्तों में बुने फूल, चावल और अगरबत्ती की लौ - दिन शुरू होने से पहले ही दहलीज़ों पर, डैशबोर्ड पर, दुकानों के काउंटर पर नज़र आने लगते हैं। यह ‌‘त्रि हिता करण‌’ के फ़लसफ़े में रचा-बसा रोज़ का शुक्रगुज़ारी का काम है - इंसान, प्रकृति और ईश्वर के बीच सामंजस्य, तीनों बराबर। इसे किसी दीवार पर टंगे आदर्श वाक्य की तरह नहीं, बल्कि नाश्ते से पहले निभाई जाने वाली आदत की तरह बरता जाता है, चाहे कोई देख रहा हो या नहीं। उन छोटे प्रसादों के पास से गुज़रते हुए, जिन्हें पैरों तले कुचला जाना और अगले ही दिन फिर से बना लिया जाना तय है, मुझे संतुलन का मतलब कुछ अलग समझ आया - यह एक बार पा लेने वाली चीज़ नहीं, बल्कि कुछ ऐसा है जिसे हर सुबह, विनम्रता से, नए सिरे से बनाना पड़ता है।

साउथ अफ्रीका: हम हैं, तो मैं हूं

साउथ अफ्रीका में पहली बार मैंने ‌‘उबुंटु‌’ को ठीक से समझा - यह फ़लसफ़ा जिसे अक्सर ‌‘मैं हूँ, क्योंकि हम हैं‌’ कहा जाता है। यह सिर्फ़ किसी ग्रीटिंग कार्ड की भावुक लाइन नहीं, बल्कि यह सच में वहाँ लोगों के एक-दूसरे से पेश आने के तरीक़े को गढ़ती है - समुदाय और आपसी जुड़ाव को अकेले की कामयाबी से ऊपर रखा जाता है।

कैम्प्स और लॉज में काम करने वाले गाइड और स्टाफ़ जिस सहजता से अपने गाँवों और साझा ज़िम्मेदारियों की बात करते थे, उसमें ‌‘मेरी कामयाबी‌’ और ‌‘हमारी कामयाबी‌’ के बीच कोई फ़र्क़ नहीं था। इसने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि जिसे मैं अपनी ‌‘आत्मनिर्भरता‌’ कहती हूँ, वो कहीं न कहीं उन लोगों को नज़रअंदाज़ करने का ही नतीजा तो नहीं, जो चुपचाप मुझे संभाले हुए हैं।

अंटार्कटिका: धरती के आख़िरी छोर पर वफ़ादारी

अंटार्कटिका ने भी अपने बर्फ़ीले, सुदूर अंदाज़ में उतना ही कुछ सिखाया। मैंने पेंगुइन माता-पिता को अपने बच्चों की देखभाल बारी-बारी से करते देखा, इतने अनुशासन के साथ कि मेरा अपना मल्टीटास्किंग शर्मिंदा हो जाए - एक चूज़े की रखवाली करता, तो दूसरा खाना लाने समंदर में उतर जाता, फिर बारी बदल जाती, रोज़-रोज़, ऐसे तापमान में जहाँ हम में से ज़्यादातर पेरेंटिंग का ख़याल ही छोड़ दें। मैंने यह भी जाना कि किलर व्हेल्स झुंड बनाकर मिलकर शिकार करती हैं, और अक्सर माएँ ही शिकार पर निकलती हैं जबकि बच्चे अपनी नानी के पास रहते हैं - साझा देखभाल की यह व्यवस्था, जिसे हम आज का तरक़्क़ीपसंद ख़याल समझते हैं, ऑर्कास लाखों सालों से चुपचाप निभा रही हैं। और यह भी सीखा कि अल्बाट्रॉस, जो बिना पंख फड़फड़ाए हज़ारों मील उड़ सकते हैं, ज़िंदगी भर एक ही साथी के साथ रहते हैं, हर मौसम में उसी साथी के पास, अक्सर बर्फ़ के उसी टुकड़े पर लौटकर आते हैं। उस चौंधियाने वाली, सफ़ेद, सुनसान ज़मीन पर खड़े होकर एक अजीब सी विनम्रता महसूस हुई, यह जानकर कि वफ़ादारी, साझा पालन-पोषण और समर्पण कभी इंसानों की ईजाद नहीं थे। इस धरती पर हमारे साथ ऐसे जीव भी रहते हैं जो इन क़दरों को हमारी किताबों और उपदेशों से बहुत पहले से जी रहे हैं।

असली सबक

इन सारे पलों को पीछे मुड़कर देखूं तो - सिएटल में एक बरिस्ता की छोटी मेहरबानी, टोक्यो का एक एस्केलेटर, मराकेश में चाय के तीन गिलास, बाली की दहलीज़ पर रखे फूल, अंटार्कटिका में बारी-बारी पालन-पोषण करते पेंगुइन, न्यूज़ीलैंड से सीखी आदत की वजह से पुणे के ट्रैफ़िक में रास्ता देती एक फाइनेंशियल एक्सपर्ट - सब एक ही दिशा में इशारा करते नज़र आते हैं। इनमें से एक भी सबक मुझे किसी क्लासरूम में नहीं पढ़ाया गया, और मैं इनकी तलाश में भी नहीं निकली थी। ये सब मुझे इसलिए मिले क्योंकि मैं वहाँ मौजूद थी, ध्यान दे रही थी, किसी जगह से हैरान होने के लिए तैयार थी, बस गुज़र जाने के बजाय।

यही वजह है कि सफ़र इतना कमाल का गुरु साबित होता है। यह लेक्चर नहीं देता। यह बस आपको किसी पल के बीचोंबीच ला खड़ा करता है - एक शेर जो आसान शिकार को नज़रअंदाज़ कर देता है क्योंकि उसे भूख नहीं है, एक अजनबी जो आपके दो डॉलर की कमी को बिना सोचे अपने ऊपर ले लेता है, एक पूरा देश जो चुपचाप मान लेता है कि एस्केलेटर की एक साइड खाली रखनी है - और फिर सबक को अपने वक़्त पर आने देता है, बिल्कुल तब जब आप उसे कबूल करने के लिए तैयार होते हैं। बस इतना करना है - वहाँ पहुँच जाना, फ़ोन जेब में रखना, और दुनिया को सिखाने देना। दुनिया के पास कहने को हमेशा हमारी उम्मीद से ज़्यादा होता है, बस हमें रुककर सुनना आना चाहिए। शायद इसीलिए हर सफ़र, चाहे कहीं का भी हो, आख़िर में एक जैसा ही निकलता है - कुछ सिखानेवाली राहें, जो हमें हर बार थोड़ा और इंसान बना जाती हैं।

 

Tags:

Post your Comment

Please let us know your thoughts on this story by leaving a comment.

Get in touch with us

Share your details for a call back and subscribe to our newsletter for travel inspiration.

+91

Listen to our Travel Stories

You May also like

View all
अ नेवर एंडिग स्टोरी
13 mins, read

अ नेवर एंडिग स्टोरी

Published in Navbharat Times 18th October 2026 ...ब्रेकफ़ास्ट कब ब्रंच बन जाता है, पता नहीं चलता। एक गैलरी दूसरी तक ले जाती है, और डिनर न जाने कैसे किसी ऐसे छोटे से दरवाज़े के पीछे खत्म होता है जिसे

कुदरत का अनोखा रंगोत्सव देखने, चलिए जापान!
13 mins, read

कुदरत का अनोखा रंगोत्सव देखने, चलिए जापान!

Published in Navbharat Times 11th October 2026 ऑटम फॉलिएज हाल ही में मुझे भारत की कुछ प्रमुख टूर कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ न्यू साउथ वेल्स और ऑस्ट्रेलिया के कुछ मंत्रियों की हुई एक मीटिंग

अल्बानिया
13 mins, read

अल्बानिया

Published in Navbharat Times 4th October 2026 ...धातु की वह बारीक ऩक्क़ाशी बेहद नाज़ुक और ख़ूबसूरत थी, जिसमें पीढ़ियों का इल्म और हुनर समाया हुआ था। ज़ाहिर है, पारंपरिक अल्बानियाई चाँदी के झुमके और...

Veena World tour reviews

What are you waiting for? Chalo Bag Bharo Nikal Pado!