Published in Navabharat Times 1st November 2026
...उनके गोल-मटोल चेहरे और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गएहाव-भाव उनमें अपनापन भर देते थे, खासकर एक आकृति, जिसका मुँह फुलाया हुआ चेहरा मुझे...
“तुम सफ़र में बिल्कुल बदल जाती हो, कितनी ज़िंदादिल हो जाती हो!” छुट्टियों पर साथ घूमते हुए मेरे दोस्त अक्सर मुझसे यह कहते रहे हैं। मैं हमेशा से मानती आई हूँ कि मैं कहीं भी रहूँ, मेरे साथ वक्त अच्छा ही गुज़रता है, लेकिन उनकी इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। शायद सफ़र सचमुच मेरा सबसे अच्छा रूप सामने ले आता है। मेरे ज़्यादातर सफ़र काम से जुड़े होते हैं, जिनमें दिन होटलों का मुआयना करने, डेस्टिनेशंस को खंगालने और कॉर्पोरेट इवेंट्स के लिए वेन्यू परखने में बीतते हैं। लेकिन जैसे ही ये अपॉइंटमेंट्स पूरे होते हैं, मैं बाहर निकल पड़ती हूँ और फ़ुर्सत से शहर को जानने लगती हूँ। बरसों में मैंने पाया है की मेरी कुछ सबसे यादगार खोजें सबसे अनपेक्षित जगहों से शुरू हुई हैं।
जॉर्जिया की अपनी पहली यात्रा पर मैं इस देश के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानती थी, सिवाय इसके कि सैलानियों के बीच इसकी लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ रही है। तिब्लिसी में हमारे दिन में होटल इंस्पेक्शन, साइटसीइंग और केबल-कार की सवारी शामिल थी। उसी सवारी के दौरान अचानक एक स्ट्रीट सिंगर की आवाज़ में ‘मेरा जूता है जापानी’ सुनाई दिया, और अनजाने नज़ारों के बीच एक जाना-पहचाना सुर गूँज उठा।
हमने ‘मदर ऑफ़ जॉर्जिया’ को भी देखा, जो शहर के ऊपर एक हाथ में वाइन का प्याला और दूसरे में तलवार लिए खड़ी है। इसका मतलब बिल्कुल साफ़ है: दोस्त बनकर आनेवालों की मेहमाननवाज़ी, और दुश्मनों से मुकाबले के लिए हमेशा तैयार।
उस मूर्ति को देखकर मुझे एहसास हुआ कि मूर्तियाँ, चाहे वे भव्य स्मारक हों या गली के किसी नुक्कड़ पर चुपचाप खड़ी कोई साधारण-सी आकृति, अक्सर वह बता देती हैं, जो किसी डेस्टिनेशन के सबसे बड़े आकर्षण भी नहीं बता पाते। उनमें झलक मिलती है कि कोई समाज किन चीज़ों को संजोता है, किस बात का शोक मनाता है, किस बात पर हँसता है और आनेवाली पीढ़ियों को क्या याद रखवाना चाहता है। और मेरी अगली खोज मेरी इस बात को सही साबित करनेवाली थी।
बाद में, सिओनी स्ट्रीट के पास ओल्ड टाउन में टहलते हुए मेरी नज़र काँसे की एक छोटी आकृति पर पड़ी, जो हाथ में पीने का एक पात्र उठाए हुए थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी के नाम जाम उठा रहा हो। पता चला कि वह एक तामाडा है, यानी पारंपरिक जॉर्जियाई दावत में टोस्ट पेश करनेवाला मेज़बान। यह मूर्ति काँसे की उस छोटी-सी प्रतिमा का बड़ा रूप है, जिसके हाथ में सींग से बना प्याला है और जो वानी नाम की जगह पर मिली थी। इसे ईसा पूर्व सातवीं सदी का माना जाता है। यूँ ही संयोग से हुई इस मुलाकात ने मेरे लिए जॉर्जिया की सबसे पुरानी और आज तक कायम सांस्कृतिक परंपराओं में से एक का दरवाज़ा खोल दिया था।
इस परंपरा के केंद्र में है सुप्रा - एक ऐसी दावत, जिसमें खाना, वाइन और बातचीत लोगों को एकसाथ जोड़ते हैं। सुप्रा की शुरुआत में ही तामाडा चुना जाता है, और वह जाम के हर दौर के लिए एक तय विषय रखता है, जैसे शांति, मातृभूमि, परिवार, पुरखे, वे अपने जो अब इस दुनिया में नहीं रहे, और आनेवाली पीढ़ियाँ। जब तक तामाडा विषय तय न कर दे, तब तक न कोई वाइन पी सकता है, न टोस्ट के लिए कुछ बोल सकता है। तामाडा ऐसे टोस्ट्स के ज़रिये महिफ़ल को आगे बढ़ाता है, जो मौके की अहमियत को स्वीकारते हैं और रिश्तों, यादों और साझा मूल्यों का सम्मान करते हैं। इस भूमिका के लिए वाकपटुता, हास्य-बोध और सूझबूझ चाहिए, साथ ही दस्तरखान का माहौल बनाए रखने का हुनर भी।
मुझे जिस बात ने सबसे ज़्यादा आकर्षित किया, वह था साथ होने के पलों को सोच-समझकर दिया जानेवाला महत्त्व। एक टोस्ट किसी को याद करने, उसका धन्यवाद करने या अपनी ऐसी कोई अनुभूति व्यक्त करने का मौका बन जाता है, जो वरना शायद अनकहा ही रह जाता। बाद में, एक पारंपरिक जॉर्जियाई रेस्टोरेंट में मुझे इसे सचमुच होते देखने का सौभाग्य मिला। वहाँ कई पीढ़ियोंवाला एक परिवार साथ बैठकर खाना खा रहा था। बीच-बीच में टोस्ट पेश किए जा रहे थे, बुज़ुर्ग बातचीत का आनंद ले रहे थे और बच्चे इस संस्कृति को, जीने के तरीके के रूप में आत्मसात कर रहे थे।
उस अनुभव ने दूसरी जगहों की मूर्तियों को देखने का मेरा नज़रिया ही बदल दिया। टोक्यो के शिबुया स्टेशन के बाहर मैंने काँसे से बने कुत्ते हाचिको को देखा, जिसकी कहानी दुनिया के सबसे व्यस्त शहरी इलाकों में से एक में, भावनाओं से भरा एक ठहराव ले आती है। हाचिको नियमित रूप से स्टेशन पर अपने मालिक, प्रोफ़ेसर हिदेसाबुरो उएनो से मिलने आता था। 1925 में प्रोफ़ेसर के गुज़र जाने के बाद भी वह बरसों तक वहाँ लौटता रहा, उस जानी-पहचानी आमद का इंतज़ार करता रहा, जो अब कभी होनेवाली नहीं थी। 1935 में जब उसकी मौत हुई, तब तक वह अपनी वफ़ादारी के लिए दूर-दूर तक मशहूर हो चुका था। एक बात ने मुझे खास तौर पर छू लिया - 1934 में जब उसकी पहली मूर्ति का अनावरण हुआ, तब हाचिको खुद वहाँ मौजूद था। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान उस मूर्ति को धातु के लिए सौंप देना पड़ा, और 1948 में उसकी जगह नई मूर्ति लगाई गई। उसे फिर से स्थापित करने का यह संकल्प बताता है कि उसकी कहानी लोगों के दिलों में कितनी गहराई तक उतर चुकी थी। उसकी मूर्ति अब मिलने की एक जगह बन चुकी है, जहाँ लोग अपने दोस्तों और अपनों की राह देखते हैं और फिर साथ-साथ अपने सफ़र पर निकल पड़ते हैं।
प्राग में जिस आकृति ने मेरा ध्यान खींचा, वह कहीं ज़्यादा रहस्यमयी थी: एक हुडवाला लबादा, जिसके अंदर कोई इंसान दिखाई नहीं देता। जब मैं वहाँ गई थी, तब आना ख्रोमी की कृति इल कोमेंदातोरे, जिसे द ‘क्लोक ऑफ़ कॉन्शियंस’ भी कहा जाता है, एस्टेट्स थिएटर के बगल में खड़ी थी। उसके खोखले भीतरी हिस्से ने मुझे और करीब खींच लिया, मानो गौर से देखने पर उसकी सिलवटों में छिपी किसी मौजूदगी का पता चल जाएगा। मोज़ार्ट के ऑपेरा डॉन जोवानी से इस मूर्ति के जुड़ाव ने यह एहसास और गहरा कर दिया। ऑपेरा में मारा गया कोमेंदातोरे, पत्थर की मूर्ति बनकर डॉन जोवानी के सामने लौट आता है, और पश्चाताप करने से इनकार ही डॉन जोवानी के पतन का कारण बनता है। यह मूर्ति रंगमंच की उस दुनिया को सड़क पर ले आई थी, और ज़मीर और जवाबदेही के सवालों को एक ठोस रूप दे रही थी।
दक्षिण कोरिया के नामी आइलैंड पर मैं वहाँ के नज़ारों में जगह-जगह बिखरी चंचल आकृतियों की ओर खिंची चली गई। उनके गोल-मटोल चेहरे और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए हाव-भाव उनमें अपनापन भर देते थे, खासकर एक आकृति, जिसका मुँह फुलाया हुआ चेहरा मुझे बिल्कुल जाना-पहचाना लगा। यह आइलैंड खुद को काल्पनिक नामीनारा रिपब्लिक के रूप में पेश करता है, जहाँ गैलरियाँ, किताबें, संगीत और कला से जुड़ी जगहें इसकी अनोखी पहचान गढ़ती हैं। ये मूर्तियाँ इस कल्पनाशील माहौल में सहज ही घुल-मिल जाती हैं, और सैलानियों को सिर्फ़ किसी गैलरी के भीतर नहीं, बल्कि चलते-फिरते कला से रूबरू होने का न्योता देती हैं।
ब्रसेल्स ने ‘मानेकेन पी’ के माध्यम से शहर के विनोदी स्वभाव से एक और मुलाकात करवाई, यानी पेशाब करते एक नन्हे लड़के का छोटा-सा फव्वारा। उसकी अहमियत क़ाफी हद तक उस लगाव और उन किस्सों की वजह से है, जो उसके इर्द-गिर्द जमा होते गए। इनमें उस लड़के की दंतकथा भी शामिल है, जिसने एक सुलगते फ़्यूज़ को बुझाकर पूरे शहर को बचा लिया था। मुझे ये दंतकथाएँ बहुत कुछ बताती लगती हैं। ये दिखाती हैं कि कोई समाज किसी आकृति के इर्द-गिर्द अपनी पहचान कैसे गढ़ता है।
मैं ‘जानेके पी’ को भी देखने गई, जो उसकी कम मशहूर महिला जोड़ीदार है। 1987 में अनावरण की गई इस मूर्ति का मकसद था एक उपेक्षित, बंद गली की ओर सैलानियों को खींचना, स्त्री और पुरुष की बराबरी को मान देना, और ब्रसेल्स के उस बागी हास्य को व्यक्त करना जिसे ज़्वान्ज़ कहा जाता है।
एक साथ देखें, तो इन आकृतियों ने मुझे एक ऐसे शहर से मिलवाया, जो खुद पर हँसने में ज़रा भी नहीं झिझकता।
कुछ मूर्तियाँ आपको मुस्कुराने पर मजबूर करती हैं, तो कुछ भावुक कर देती हैं। बुडापेस्ट में शूज़ ऑन द डेन्यूब बैंक स्मारक ने बिल्कुल अलग तरह से ध्यान आकर्षित किया। नदी के किनारे लोहे के जूतों की साठ जोड़ियाँ रखी हैं, जिन्हें फ़िल्मकार जान तोगाय और मूर्तिकार ग्युला पाउर ने मिलकर बनाया है। ये उन लोगों की याद में हैं, जिन्हें 1944-45 में हंगरी के ऐरो क्रॉस मिलिशिया ने गोली मारकर डेन्यूब में गिरा दिया था, और जिनमें से बहुत-से यहूदी थे। मुझे जिस बात ने भीतर तक झकझोरा, वह थी इतनी भयानक क्षति को दर्शाने के लिए चुनी गई चीज़ों की आत्मीयता। जूते रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा होते हैं, उनमें इंसान की आदतों, उसके काम और उसके सफ़रों के निशान रहते हैं। यहाँ उनके खालीपन ने मेरा ध्यान उन लोगों की ओर मोड़ दिया, जिनके पैरों में इन्हें होना चाहिए था। इस स्मारक को देखकर मुझे एहसास हुआ कि किसी डेस्टिनेशन को समझने में उसके दर्दनाक इतिहास का सामना करना भी शामिल है।
पोलैंड के व्रोत्सवाफ़ में मेरा सामना एक और ऐसी मूर्ति से हुआ, जिसने शहर की एक सड़क की आम-सी सूरत में बेचैनी भर दी। ये ज़ी कालिना की कृति मॉन्यूमेंट ‘टू द एनॉनिमस पासरबाय’ में काँसे की चौदह आकृतियाँ दिखाई गई हैं, जो सड़क के एक ओर फ़ुटपाथ में धँसती जाती हैं और दूसरी ओर उससे बाहर निकल आती हैं। उनके रोज़मर्रा के कपड़े उन्हें जाना-पहचाना बना देते हैं, और यही बात उनके गायब होने को और भी विचलित कर देनेवाला बना देती है। इस कृति की शुरुआत 1977 में कालिना के इंस्टॉलेशन पैसेज से हुई थी, यानी पोलैंड में मार्शल लॉ लागू होने से पहले। बाद की घटनाओं ने इसे दमन और प्रतिरोध से जोड़ दिया, और 2005 में व्रोत्सवाफ़ में लगाया गया इसका काँसे के रूप समय के साथ जुड़ते गए उन सारे अर्थों को अपने साथ लिए हुए है। उन आकृतियों को देखते हुए मैं सोच रही थी कि राष्ट्रीय उथल-पुथल के किस्सों में आम लोगों की ज़िंदगियाँ कितनी आसानी से नज़रों से ओझल हो जाती हैं।
बाली में एयरपोर्ट के पास बने घटोत्कच स्मारक ने एक जानी-पहचानी कहानी को एक अलग सांस्कृतिक माहौल में पहचानने का सुख दिया। यह नाटकीय आकृति महाभारत से ली गई है। बाली के आधुनिक ट्रैफ़िक के बीच उससे रूबरू होकर मैं सोचने लगी कि कहानियाँ कैसे सफ़र करती हैं, नई ज़मीन में जड़ें जमाती हैं और वहाँ अपनी अलग स्थानीय पहचान पा लेती हैं। यही अपनापन बाली की परंपराओं के बारे में मेरी जिज्ञासा की शुरुआत बन गया। इस स्मारक ने मुझे याद दिलाया कि सांस्कृतिक रिश्ते सरहदों और सदियों के पार फैल सकते हैं, और फिर भी उन जगहों में गहराई से जड़ें जमाए रहते हैं, जो उन्हें सींचती हैं।
स्कॉटलैंड के केल्पीज़ से हुई मुलाकात भी उतनी ही यादगार थी, पर बिल्कुल अलग पैमाने पर। फ़ॉलकर्क में एंडी स्कॉट के बनाए स्टील के दो विशाल घोड़ों के सिर ज़मीन से तीस मीटर ऊपर तक उठे हुए हैं। इनका नाम स्कॉटिश लोककथाओं की याद दिलाता है, जबकि इनका रूप उन मेहनतकश घोड़ों को सलाम करता है, जिन्होंने स्कॉटलैंड की अर्थव्यवस्था में योगदान दिया। इनमें वे घोड़े भी शामिल हैं, जो नहरों में बजरों को खींचा करते थे। इनके विशाल आकार ने मुझे प्रभावित तो किया, लेकिन इनके पीछे छिपी आदरांजलि ज़्यादा देर तक मेरे ज़ेहन में रही।
इन मुलाकातों को पलटकर देखती हूँ, तो एहसास होता है कि किसी मूर्ति के पास बस कुछ पल ठहर जाने से मैंने कितना कुछ सीखा है। एक तामाडा, एक वफ़ादार कुत्ता, एक खाली लबादा, जूतों की एक जोड़ी या एक विशाल घोड़ा - ये सब ऐसी कहानियों तक ले जा सकते हैं, जो पूरे सफ़र को और भी समृद्ध बना दें। ये मुझे उन स्मारकों के बारे में भी सोचने पर मजबूर करते हैं, जिन्हें आज हम बनाना चुनते हैं। मशहूर नेताओं और जाने-पहचाने नायकों के साथ-साथ, और किसकी करुणा, कल्पनाशीलता या रोज़मर्रा का योगदान हमारी सार्वजनिक जगहों में स्थायी जगह पाने का अधिकारी है?
मेरी उम्मीद है कि हम आनेवाले मुसाफ़िरों के लिए ऐसी आकृतियाँ छोड़कर जाएँ, जो उनकी जिज्ञासा का प्रतिसाद दें, और आनेवाली पीढ़ियों के लिए ऐसी कहानियाँ,जो उन्हें समझा सकें कि हमारे लिए किस तरह की ज़िंदगी मायनेरखती थी।








































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